बोहत-कुछ
ऐसे बोहत देखा हु मै
ऐसे बोहत सहा हु मै
और ऐसे बोहत देखके सेहके
बोहत भुला भी तो हु मए !
तू थी ना बोहत सारी ?
तेरा था ना बोहत सारी ?
फिर भी तेरे वो बोहत के सामने
एक कुछ ही था ना मए ?
अभी भी एक जरा सा कुछ ही हु ना मए
पर...
पर ये कुछ ने ही तो तुझे चलने ..
नहीं नहीं,चलने तो तू जानती थी
तू चलती थी ,तू बोहत चलती थी
इधर से उधर,
बोहत दूर ,बोहत पास ,
कभी किसीके साथ कभी अकेले
पर तू चलती थी
और चलते चलते तू रुक भी जातीथी
ना?
बोहत बार
बोहत बोहत बौहत बार !
तब कौन
कौन सीखा तुझे फिर से और एक बार
सुरु करने को?
और एक बार जिन्दा रहने को
फिर से हस्ते रहने को
वो कुछ ही ना !
कौन बोटा था तुझे चलते रहने को ?
वो कुछ ही ना !
है सिखाया तुझे वो चलते तरहने को,
हस्ते रहने को,
सीखते रहने को ,
पर वो मामूली सा एक कुछ के लिए नहीं ,
तेरे खुद के लिए।
नहीं रे एकदम नहीं
तू कुछ नहीं सोचके ही चलते रहे ,
जितना दूर हो सके
किउकी रुक भी जाएगी तो
वो कुछ तो होगाही ना उधर ,
किनता भी मामूली सा ,
तेरे बोहतके मुकाबले !
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